कौन हैं राधा – और कृष्ण से उनका क्या सम्बन्ध है ?

सभी मित्रों को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनयें !!

Radha Krishna

जहाँ हाल में सभी हिन्दू त्योहारों को येन केन प्रकारेण किसी ना किसी प्रकार निशाना बनाया जाता रहा है ,वहीँ पूरा प्रयास कियाजाता है की अपने ही त्योहारों , देवी देवताओं को लेकर हिन्दू लज्जित अनुभव करें | इसी कड़ी में भगवान् कृष्ण और जन्माष्टमी का पवित्र त्यौहार भी बौद्धिक आतंकवादियों के निशाने पे आ गया है | नहीं मै माननीयों द्वारा मटकी की उचाई निर्धारित करने की बात नहीं कर रहा हूँ, मै PETA द्वारा जारी किये गए उस फतवे की बात भी नहीं कर रहा हूँ जिसमे उनने गाय का दूध ना निकलने की हास्यापद बात कही है | दरअसल बुद्धिजीवियों का आतंक और जाल एक ऐसे वृक्ष की तरह फैला है जो जितना भूमि के ऊपर दिखता है उससे कहीं अधिक वह भूमि के नीचे अदृश्य रूप में है | और धीरे धीरे इनके बौद्धिक स्लीपर सेल्स मीडिया में, बॉलीवुड में , शिक्षण संस्थाओं में अच्छी जगह स्थापित होकर भारतीय संस्कृति और भारतीयता की जड़ें खोद रहे हैं |

अभी हुआ यो की काम के सिलसिले में मुझे Allahabad लगातार जाना पड़ा , और मेरा सौभाग्य की ऐसे में मुझे प्रयागराज की पवित्र धरती पर परम ज्ञानी साधकों और साधु संतो से मिलने का अवसर भी मिला | ऐसे में यदा कदा संत जन धर्म पर चर्चा करते थे और कई बार अपने अनुभव भी साझा करते थे|

ऐसे ही एक बार चर्चा चली राधा और कृष्ण की| स्वामी जी परम ज्ञानी थे और जिज्ञासा वश पूछे गए सवालों का जवाब पूरा रस लेकर उदाहरण सहित धैर्यपूर्वक दे रहे थे | मेरा भी मन ना हुआ उठने का जब वहीँ बैठे तीन चार लोगों में से किसी ने पूछ लिया – स्वामी जी ये बताईये जब हम और कृष्ण का नाम लेते हैं , तो राधाजी का नाम ही क्यों लिया जाता है साथ में , रुक्मिणी जी का क्यों नहीं लिया जाता |

मुझे सवाल रुचिकर लगा , अतः उत्तर जानने की उत्सुकता में मै भी वहां बैठा रहा | स्वामी जी मुस्कराये, और बोले ये सवाल आज जिज्ञासा वश , मर्यादा में रह कर , एक संत से उत्तर की अपेक्षा में पूछा गया है , किन्तु एक वृत्तांत ऐसा भी हुआ है उनके साथ जब , ये सवाल जिज्ञासा वश नहीं, बुद्धिजीवी होने के अहंकार में , मर्यादाये लांघ कर , एक संत को अपमानित एवं लज्जित करने के लिए पूछा गया था | BHU जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संसथान में संस्कृत की एक छात्रा ने स्वामी जी पर व्यंग बाण चला कर पूछा था –
” स्वामी जी, कृष्ण के साथ जो महिला की मूर्ति होती है, वो वहां लिखा तो नहीं होता की वो राधा की मूर्ति है , वो तो रुक्मिणी की मूर्ति है , लेकिन आप लोग मर्द लोग हो, और आप लोग लोगों को ये बतलाते हो की वो राधा हैं, आपका लोगों को ये बताना , आपकी प्रवृत्ति के बारे में बतलाता है ”

मतलब कुल मिला के वो सवाल भी नहीं पूछ रही थी ना ही उसका उत्तर जानने को उत्सुक थी , वो तथाकथित बुद्धिजीवी छात्रा तो ना केवल स्वामी जी पर एक्स्ट्रा marital अफेयर्स को प्रमोट करने का आरोप लगा रही थी वरन हमारे पूजनीय राधाजी और श्री कृष्ण को भी कठघरे में खड़ी कर रही थी | ऐसे मलिन सोच ऐसे संसथान में कैसे घुसी, वो छात्रा की व्यक्तिगत सोच है, अथवा उन जैसे सभी छात्रों को ऐसे ही मलिन और हिन्दू विरोधी विचारों के लिए प्रशिक्षित किया गया है , ये सोचने का विषय है | कहने के मतलब ये है, की बात अब सिर्फ ध्वनि प्रदुषण रहित दिवाली , और जल रहित होली तक सीमित नहीं है, वरन और भी वैचारिक टाइम bombs हैं, जिनके बीज आज बो दिए गए हैं, और वो हिन्दू संस्कृति पर आने वाले दिनों में फटेंगे, जबकि एक पूरी की पूरी नयी पीढ़ी भारतीय संस्कृति और दर्शन का मखौल उड़ाने वाली निकलेगी| ये वो पीढ़ी होगी जो स्वामी विवेकानन्द और आदि शंकरचार्य के पवित्र दर्शन को तो नहीं मानेगी, लेकिन सभी हिन्दू शांस्त्रों को चाहे वो रामायण हो अथवा भगवद गीता हो, wendy Doniger और Sheldon Pollock के घृणित चश्मे से देखेगी और समझेगी| आज भी एयरपोर्ट्स पर स्वामी विवेकानंद की किताबों की जगह जब wendy doniger जैसे लेखकों की किताबों का भण्डार देखता हूँ तो मन व्यथित हो उठता है , हम कल गुलाम थे , इसिलए अपनी भव्य और विशाल संस्कृति को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत नहीं कर सके, लेकिन स्वतंत्रता के बाद भी यदि हम अपनी जड़ों से अनभिज्ञ रहेंगे और अपने धर्म को, ज्ञान को सही परिपेक्ष्य में नहीं समझेंगे तो हमारा पतन निश्चित है |

बहरहाल अब आते हैं की स्वामी जी ने उत्तर क्या दिया – दरअसल राधा कोई प्रेमिका नहीं है, वस्तुतः हमारे शरीर की आध्यात्मिक शक्ति /ऊर्जा जो एक धारा के रूप में ऊपर से नीचे बहती है , यही धारा जब हम साधन के पथ पर आगे बढ़ते हैं, उर्ध्वगामी हो जाती है – मतलब नीचे से ऊपर बहती है , विपरीत दिशा में बहने लगती है। धारा की इसी विपरीत दिशा को हम राधा कहते हैं | जो हम सबके अंदर होती है | इसीलिए हम ये मानते हैं की राधा के मिलने से ही ( ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन – कुण्डलिनी जगरण) से ही हमे कृष्ण (ब्रह्म ) प्राप्त होंगे | ये राधा तो सदैव से कृष्ण जैसे साधक के पास थीं |

हमारे पुराने शास्त्रों में राधा का कोई वर्णन नहीं है | राधा कोई एक किसी ग्‍वाले कृष्‍ण की एक सुन्‍दर सी प्रेयसी का नाम नहीं, ना ही वो केवल वृषभान की दुलारी कन्‍या है बल्‍कि वह तो अनवरत हर कृष्‍ण अर्थात् ईश्‍वर के प्रत्‍येक अंश-अंश से मिलने को आतुर रहने वाली हर उस आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति के रूप में बहने वाली धारा का नाम है जो भौतिकता के नश्‍वरवाद से आध्‍यात्‍मिक चेतना की ओर बहती है, उसमें एकात्‍म हो जाने को… बस यहीं से शुरू होती है किसी के भी राधा हो जाने की यात्रा ।

इसी ‘राधा होते जाने की प्रक्रिया’ को ओशो अपने प्रवचनों में कुछ यूं सुनाते हैं—‘‘पुराने शास्त्रों में राधा का कोई जिक्र नहीं । वहां Gopi Ras Leelaगोपियाँ हैं, सखियाँ हैं, कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं और रास की लीला होती है। राधा का नाम पुराने शास्त्रों में नहीं है। बस इतना सा जिक्र है, कि सारी सखियों में कोई एक थीं, जो छाया की तरह साथ रहती थीं। यह तो महज सात सौ वर्ष पहले ‘राधा’ नाम प्रकट हुआ । उस नाम के गीत गाए जाने लगे, राधा और कृष्ण को व्‍यक्‍ति के रूप में प्रस्‍थापित किया गया । इस नाम की खोज में बहुत बड़ा गणित छिपा है । राधा शब्द बनता है धारा शब्द को उलटा कर देने से।
‘‘गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम धारा है। और धारा शब्द को उलटा देने से राधा हुआ, जिसा अर्थ है—स्रोत की तरफ लौट जाना। गंगा वापिस लौटती है गंगोत्री की तरफ। बहिर्मुखता, अंतर्मुखता बनती है।’’
ओशो जिस यात्रा की बात करते हैं—वह अपने अंतर में लौट जाने की बात करते हैं। एक यात्रा धारामय होने की होती है, और एक यात्रा राधामय होने की….।

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