जीवन में सुख और दुःख !!

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या सचमुच एक दुखद घटना हैं। अपने career  की बुलंदियों को छूने वाले सुशांत को अपने जीवन को लेकर ऐसा निर्णय लेना पड़ा तो निश्चित ही वो किसी गम्भीर अवसाद से गुजर  रहे होंगे। किंतु इन सबके बावजूद भी उनका ये निर्णय चौका देने वाला है, वो भी तब जबकि उनकी पिछली ही फ़िल्म  छिछोरे जीवन में संघर्ष को लेकर संदेश दे रही थी।

ऐसा क्यों होता है कि  जीवन की ऊँचाइयों को छूते समय हम ये भूल जाते हैं की हमारी सफलता हमारे अपने प्रयासों और हमारी अपनी मेहनत के साथ साथ हमारे आस पास हो रही अनेकों घटनाओं के कारण है, जिन्हें हम संयोग या भाग्य कहते हैं। क्योंकि ये घटनायें हमारे नियंत्रण  में नहीं होती। फिर भी हम सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुँचने का श्रेय प्रायः अपने आप को और अपनी मेहनत को देना चाहते हैं। भाग्य या संयोग या इस तरह क़ि अनेकों बाह्य घटनायों की शृंखला को तो हम तब पहचानते हैं जब इनके कारण हमें असफलता का स्वाद चखना पड़ता है। फिर चाहे वो बाह्य वातावरण के कारण किसी की नौकरी का ना लग पाना हो, या किसी की नौकरी का छूट जाना हो, या किसी का अपने नाम और शोहरत से हाथ धो बैठना हो, या करोना  के कारण व्यापार का मंदा पद जाना हो। कुल मिला कर हम सफलता का श्रेय स्वयं लेना चाहते हैं किंतु असफलता का दोष अपने जीवन या भाग्य को देना चाहते हैं। 

सबसे पहले तो यही समझना होगा की हमारी सफलता या असफलता का कारण हमारे प्रयास, परिश्रम के इलावा बाह्य घटनाओं पर यानी की भाग्य पर भी निर्भर करता है, जो कि हमारे नियंत्रण में नहीं होता। ये समझने के बाद हमें स्वयं से ये प्रश्न पूछना होगा की क्या सिर्फ़ इसी कारण हमारे सुख और दुःख का कारण भी इन बाह्य घटनाओं को होना चाहिए। हम अपनी सफलता के लिए, प्रसिद्धि के लिए एक क्षण को इन बाह्य घटनाओं पर , भाग्य पर निर्भर कर सकते हैं, किंतु हमारा सुख, मन की शांति सदैव हमारे अपने ऊपर निर्भर होनी चाहिए। इस संसार कि कोई भी घटना, जीवन में बड़े बड़े से बड़ा झटका भी हमें अपने स्वयं के प्राण लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

सफलता और असफलता तो एक बार हमारे अपने इलावा किसी और के कारण हो सकते हैं, लेकिन हमारे सुख और दुःख, हमारी अपनी मनोस्थिति सदैव हमारे अपने वश में होनी चाहिए। हमारे पास सदैव  ये विकल्प होता है की जीवन में घटने वाली किसी भी घटना से हम कितना प्रभावित हों क्योंकि हमारा मन हमारे नियंत्रण में होता है, या  होना चाहिए।

मन की स्थिरता , ध्यान, अध्यात्म, जीवन में संघर्ष – ये सब मात्र हमारे facebook  status या हमारी कहानियों या फ़िल्मों तक सीमित नहीं रह सकता। हमें ये अपने जीवन में उतारना होगा। सत्य के धरातल पर बार बार परखना होगा की  हम सुख और दुःख के परिपेक्ष्य कम से कम कितना आत्म निर्भर हुए हैं।

सर्वं परवशं दुःखं सर्वं आत्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः

जो दूसरे के वश में हो  वह दुःख, जो स्वयं के वश में हो वह सुख; यही सुख और दुःखका संक्षिप्त में लक्षण है ।

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